कविता

खेटि मन परठ

भूमिका थारु

१.
हम्रे थारु आदिवासी जनजाति
जिन्गि हो हमार इहे धर्ति ओ माटि
तराइक हुइ हो हमरे टे धरतिपुत्र
अपन पहिचानले फुलठ गर्वसे छाटि ।

खेटि कैके अनाज उब्जैना हम्रे किसान
मेहनटअन्सार हम्रे कहिया पो पैबि मान
कबो समयमे न मल पैना, न बिया बालर
असौ टे झन बर्खा नैआइल कैसिक सप्रि धान ।

हाँठेम फटङ्गना नानके फोरठु मै कोडराले ढेला
सङ्घरिया कहठ का करे उठाइ टे अइसिन झमेला
डिग्रिक सर्टिफिकेट डेखाके मोर पहिचानमे प्रस्न कैना उ
घरि घरि ओइसिन व्यवहार डेखाइठ जानो उ गुरु, मै चेला ।

महि इहे मोर गाउँक माटि मन परठ
अपने गाउँ अंगना, बारिक टाँटि मन परठ
जियम इहे नैजैम हो मै टे कबो फे बिदेश
मोर जिन्गि फुलैना महि खेटिपाटि मन परठ

 

-भूमिका थारु

प्रकाशित मितिः   ९ बैशाख २०८३, बुधबार ११:१५